Monday, 6 April 2020

क्या लिखू क्या बोलूं

क्या लिखू क्या बोलूं 


क्या लिखू क्या बोलूं। 
ज़िंदगी की सचाई भी अजीब है। 
  घर से  बाहर होते है तब घर जाना जरुरी है।  
घर में होते है तब बाहर जाना जरुरी है। 
क्या करेगा ए इन्सान ज़िंदगी में तू। 
तुझे तो घर में रहना भी जरुरी है और बाहर जाना भी जरुरी है।  
समझ पाया नहीं कोई कुदरत के इस खेल को। 
नियम ही है कुछ ऐसे की समझ पाया नहीं इन्सान।  
क्या लिखू क्या बोलू। 
ज़िंदगी की सचाई भी बहुत अजीब है। 
कुछ पल सोचा चैन से बैठ जाऊं काम करने के बाद
पर बैठने के बाद सोचता हूं कल क्या होगा भगवान। 
कल क्या होगा भगवान ये सोचकर। 
तू कभी चैन से बैठ नहीं सकता  ए इन्सान।  
क्या लिखू क्या बोलू।  
ज़िंदगी की सचाई भी बहुत अजीब है। 
तुझे तो घर में रहना भी जरुरी है बाहार जाना भी जरुरी है।
☺☺☺
धन्यवाद 

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